Friday, May 10, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा ओव्या १५५८ ते १५८७



ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर
 
ओव्या १५५८ ते १५८७

अर्जुन उवाच।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३॥

मोह नष्टला स्मृति लाभली तुझ्या प्रसादाने अच्युता स्थिर झालो मी गेला संदेह करीन आता तू म्हणसी ते

मग अर्जुन म्हणे काय देवो | पुसताति आवडे मोहो |
तरी तो सकुटुंब गेला जी ठावो | घेऊनि आपला ॥ १५५८ ॥

पासीं येऊनि दिनकरें | डोळ्यातें अंधारें |
पुसिजे, हें कायि सरे | कोणे गांवीं ? ॥ १५५९ ॥

सरे=  शक्य आहे

तैसा तूं श्रीकृष्णराया | आमुचिया डोळयां |
गोचर हेंचि कायिसया | न पुरे तंव ॥ १५६० ॥

कायिसया=कश्या प्रकारे

वरी लोभें मायेपासूनी | तें सांगसी तोंड भरूनी |
जें कायिसेनिही करूनी | जाणूं नये ॥ १५६१ ॥

मायेपासूनी=आई हून आधिक
कायिसेनिही=आणि कश्यानेही

आतां मोह असे कीं नाहीं | हें ऐसें जी पुससी काई |
कृतकृत्य जाहलों पाहीं | तुझेपणें ॥ १५६२ ॥

कृतकृत्य=पूर्ण समाधानी

गुंतलों होतों अर्जुनगुणें | तो मुक्त जालों तुझेपणें |
आतां पुसणें सांगणें | दोन्ही नाहीं ॥ १५६३ ॥

मी तुझेनि प्रसादें | लाधलेनि आत्मबोधें |
मोहाचे तया कांदे | नेदीच उरों ॥ १५६४ ॥

कांदे=समूळ या अर्थाने

आतां करणें कां न करणें | हें जेणें उठी दुजेपणें |
तें तूं वांचूनि नेणें | सर्वत्र गा ॥ १५६५ ॥

ये विषयीं माझ्या ठायीं | संदेहाचे नुरेचि कांहीं |
त्रिशुद्धि कर्म जेथ नाहीं | तें मी जालों ॥ १५६६ ॥

तुझेनि मज मी पावोनी | कर्तव्य गेलें निपटूनी |
परी आज्ञा तुझी वांचोनि | आन नाहीं प्रभो ॥ १५६७ ॥

कां जें दृश्य दृश्यातें नाशी | जें दुजें द्वैतातें ग्रासी |
जें एक परी सर्वदेशीं | वसवी सदा ॥ १५६८ ॥

जयाचेनि संबंधें बंधु फिटे | जयाचिया आशा आस तुटे |
जें भेटलया सर्व भेटे | आपणपांचि ॥ १५६९ ॥

तें तूं गुरुलिंग जी माझें | जें येकलेपणींचें विरजें |
जयालागीं वोलांडिजे | अद्वैतबोधु ॥ १५७० ॥
येकलेपणींचें=ऐक्याला  विरजें=सहायक

आपणचि होऊनि ब्रह्म | सारिजे कृत्याकृत्यांचें काम |
मग कीजे का निःसीम | सेवा जयाची ॥ १५७१ ॥

गंगा सिंधू सेवूं गेली | पावतांचि समुद्र जाली |
तेवीं भक्तां सेल दिधली | निजपदाची ॥ १५७२ ॥

सेल=उत्तम भाग

तो तूं माझा जी निरुपचारु | श्रीकृष्णा सेव्य सद्गुरु |
मा ब्रह्मतेचा उपकारु | हाचि मानीं ॥ १५७३ ॥

जें मज तुम्हां आड | होतें भेदाचें कवाड |
तें फेडोनि केलें गोड | सेवासुख ॥ १५७४ ॥

तरी आतां तुझी आज्ञा | सकळ देवाधिदेवराज्ञा |
करीन देईं अनुज्ञा | भलतियेविषयीं ॥ १५७५ ॥

यया अर्जुनाचिया बोला | देवो नाचे सुखें भुलला |
म्हणे विश्वफळा जाला | फळ हा मज ॥ १५७६ ॥

विश्वफळा=विश्वाचे फळ. ईश्वराला

उणेनि उमचला सुधाकरु | देखुनी आपला कुमरु |
मर्यादा क्षीरसागरु | विसरेचिना ? ॥ १५७७ ॥

उणेनि उमचला=उणेपण नसलेला पौर्णिमेचा चंद्र

ऐसे संवादाचिया बहुलां | लग्न दोघांचियां आंतुला |
लागलें देखोनि जाला | निर्भरु संजयो ॥ १५७८ ॥
बहुलां=बोहल्यावर निर्भरु=आनंदी

तेणें म्हणतसे संजयो | बाप कृपानिधी रावो |
तो आपुला मनोभावो | अर्जुनेंसी केला ॥ १५७९ ॥

तेणें उचंबळलेपणें | संजय धृतराष्ट्रातें म्हणे |
जी कैसे बादरायणें | रक्षिलों दोघे ? ॥ १५८० ॥

बादरायणें=व्यास
 
आजि तुमतें अवधारा | नाहीं चर्मचक्षूही संसारा |
कीं ज्ञानदृष्टिव्यवहारा आणिलेती ॥ १५८१ ॥

आणि रथींचिये राहाटी | घेई जो घोडेयासाठीं |
तया आम्हां या गोष्टी | गोचरा होती ॥ १५८२ ॥

रथींचिये राहाटी=सारथी (संजय स्वत:ला म्हणतो)

वरी जुंझाचें निर्वाण | मांडलें असे दारुण |
दोहीं हारीं आपण | हारपिजे जैसें ॥ १५८३ ॥

दोहीं हारीं=दोन्ही बाजूला

येवढा जिये सांकडां | कैसा अनुग्रहो पैं गाढा |
जे ब्रह्मानंदु उघडा | भोगवीतसे ॥ १५८४ ॥

सांकडां=कठीण संकट

ऐसें संजय बोलिला | परी न द्रवे येरु उगला |
चंद्रकिरणीं शिवतला | पाषाणु जैसा ॥ १५८५ ॥

न द्रवे =कोरडा   उगला=उगा राहिला

हे देखोनि तयाची दशा | मग करीचिना सरिसा |
परी सुखें जाला पिसा | बोलतसे ॥ १५८६ ॥

सरिसा=संवाद

भुलविला हर्षवेगें | म्हणौनि धृतराष्ट्रा सांगे |
येऱ्हवीं नव्हे तयाजोगें | हें कीर जाणें ॥ १५८७ ॥

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by dr. vikrant tikone



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Sunday, May 5, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा,ओव्या १५२९ ते १५५७




ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर

ओव्या १५२९ ते १५५७


श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभा.ण्ल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१॥


आणि सर्वमार्गीं निंदा | सांडूनि आस्था पैं शुद्धा |
गीताश्रवणीं श्रद्धा | उभारी जो ॥ १५२९ ॥

तयाच्या श्रवणपुटीं | गीतेचीं अक्षरें जंव पैठीं |
होतीना तंव उठाउठीं | पळेचि पाप ॥ १५३० ॥

अटवियेमाजीं जैसा | वन्हि रिघतां सहसा |
लंघिती का दिशा | वनौकें तियें ॥ १५३१ ॥

अटवि=जंगल वनौकें=वनचर

कां उदयाचळकुळीं | झळकतां अंशुमाळी |
तिमिरें अंतराळीं | हारपती ॥ १५३२ ॥

तैसा कानाच्या महाद्वारीं | गीता गजर जेथ करी |
तेथ सृष्टीचिये आदिवरी | जायचि पाप ॥ १५३३ ॥

ऐसी जन्मवेली धुवट | होय पुण्यरूप चोखट |
याहीवरी अचाट | लाहे फळ ॥ १५३४ ॥

जन्मवेली=जन्म परंपरा  धुवट=निर्मळ धुतलेली

जें इये गीतेचीं अक्षरें | जेतुलीं कां कर्णद्वारें |
रिघती तेतुले होती पुरे | अश्वमेध कीं ॥ १५३५ ॥

म्हणौनि श्रवणें पापें जाती | आणि धर्म धरी उन्नती |
तेणें स्वर्गराज संपत्ती | लाहेचि शेखीं ॥ १५३६ ॥

तो पैं मज यावयालागीं | पहिलें पेणें करी स्वर्गीं |
मग आवडे तंव भोगी | पाठीं मजचि मिळे ॥ १५३७ ॥

पेणें=मुक्काम

ऐसी गीता धनंजया | ऐकतया आणि पढतया |
फळे महानंदें मियां | बहु काय बोलों ॥ १५३८ ॥

याकारणें हें असो | परी जयालागीं शास्त्रातिसो |
केला तें तंव, तुज पुसों | काज तुझें ॥ १५३९ ॥

शास्त्रातिसो=शास्त्र विस्तार तंव=तुझ्यासाठी
 
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२॥

काय हे ऐकलेस पार्था,तू एकाग्र चित्ताने :काय अज्ञान मोह तुझा नष्ट झाला धनंजया

तरी सांग पां पांडवा | हा शास्त्रसिद्धांतु आघवा |
तुज एकचित्तें फावा | गेला आहे ? ॥ १५४० ॥

फावा गेला=ठसला आहे

आम्हीं जैसें जया रीतीं | उगाणिलें कानांच्या हातीं |
येरीं तैसेंचि तुझ्या चित्तीं | पेठें केलें कीं ? ॥ १५४१ ॥

उगाणिलें=विवरण केले पेठें=वस्ती

अथवा माझारीं | गेलें सांडीविखुरी |
किंवा उपेक्षेवरी | वाळूनि सांडिलें | ॥ १५४२ ॥

माझारीं=मध्येच   

जैसें आम्हीं सांगितलें | तैसेंचि हृदयीं फावलें |
तरी सांग पां वहिलें | पुसेन तें मी ॥ १५४३ ॥

वहिलें= आधी चटकन

तरी स्वाज्ञानजनितें | मागिलें मोहें तूतें |
भुलविलें तो येथें | असे कीं नाहीं ? ॥ १५४४ ॥


हें बहु पुसों काई | सांगें तूं आपल्या ठायीं |
कर्माकर्म कांहीं | देखतासी ? ॥ १५४५ ॥

पार्थु स्वानंदैकरसें | विरेल ऐसा भेददशे |
आणिला येणें मिषें | प्रश्नाचेनि ॥ १५४६ ॥

पूर्णब्रह्म जाला पार्थु | तरी पुढील साधावया कार्यार्थु |
मर्यादा श्रीकृष्णनाथु | उल्लंघों नेदी ॥ १५४७ ॥

येऱ्हवीं आपुलें करणें | सर्वज्ञ काय तो नेणें ? |
परी केलें पुसणें | याचि लागीं ॥ १५४८ ॥

एवं करोनियां प्रश्न | नसतेंचि अर्जुनपण |
आणूनियां जालें पूर्णपण | तें बोलवी स्वयें ॥ १५४९ ॥

मग क्षीराब्धीतें सांडितु | गगनीं पुंजु मंडितु |
निवडे जैसा न निवडितु | पूर्णचंद्रु ॥ १५५० ॥

सांडितु=पासून वेगळा होता
पुंजु मंडितु=प्रकाशमान होणे

निवडे=निराळा दिसतो    न निवडितु= न शोधता

तैसा ब्रह्म मी हें विसरे | तेथ जगचि ब्रह्मत्वें भरे |
हेंही सांडी तरी विरे | ब्रह्मपणही ॥ १५५१ ॥

ऐसा मोडतु मांडतु ब्रह्में | तो दुःखें देहाचिये सीमे |
मी अर्जुन येणें नामें | उभा ठेला ॥ १५५२ ॥

मग कांपतां करतळीं | दडपूनि रोमावळी |
पुलिका स्वेदजळीं | जिरऊनियां ॥ १५५३ ॥
पुलिका=रोमांच  स्वेदजळीं=स्वेद्बिंदू

प्राणक्षोभें डोलतया | आंगा आंगचि टेंकया |
सूनि स्तंभु चाळया | भुलौनियां ॥ १५५४ ॥

आंगा आंगचि टेंकया=अंगा अंगाचा आधार देत
स्तंभु=कंप

नेत्रयुगुळाचेनि वोतें | आनंदामृताचें भरितें |
वोसंडत तें मागुतें | काढूनियां ॥ १५५५ ॥

वोतें=कडा

विविधा औत्सुक्यांची दाटी | चीप दाटत होती कंठीं |
ते करूनियां पैठी | हृदयामाजीं ॥ १५५६ ॥

चीप=आवंढा (पाचर)

वाचेचें वितुळणें | सांवरूनि प्राणें |
अक्रमाचें श्वसणें | ठेऊनि ठायीं ॥ १५५७ ॥

वितुळणें=विस्कटणे  अक्रमाचें=अनियमित

by dr. vikrant tikone