Saturday, April 20, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा ओव्या १४३५ ते १४५६ (सारांश )





ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर
ओव्या १४३५ ते १४५६ (सारांश )


तरी पहिला जो अध्यावो | तो शास्त्रप्रवृत्तिप्रस्तावो |
द्वितीयीं साङ्ख्यसद्भावो | प्रकाशिला ॥ १४३५ ॥

मोक्षदानीं स्वतंत्र | ज्ञानप्रधान हें शास्त्र |
येतुलालें दुजीं सूत्र | उभारिलें ॥ १४३६ ॥

मग अज्ञानें बांधलेयां | मोक्षपदीं बैसावया |
साधनारंभु तो तृतीया\- | ध्यायीं बोलिला ॥ १४३७ ॥

जे देहाभिमान बंधें | सांडूनि काम्यनिषिद्धें |
विहित परी अप्रमादें | अनुष्ठावें ॥ १४३८ ॥

ऐसेनि सद्भावें कर्म करावें | हा तिजा अध्यावो जो देवें |
निर्णय केला तें जाणावें | कर्मकांड येथ ॥ १४३९ ॥

आणि तेंचि नित्यादिक | अज्ञानाचें आवश्यक |
आचरतां मोंचक | केवीं होय पां ॥ १४४० ॥

मोंचक=मोक्ष दायी

ऐसी अपेक्षा जालिया | बद्ध मुमुक्षुते आलिया |
देवें ब्रह्मार्पणत्वें क्रिया | सांगितली ॥ १४४१ ॥

जे देहवाचामानसें | विहित निपजे जें जैसें |
तें एक ईश्वरोद्देशें | कीजे म्हणितलें ॥ १४४२ ॥

हेंचि ईश्वरीं कर्मयोगें | भजनकथनाचें खागें |
आदरिलें शेषभागें | चतुर्थाचेनी ॥ १४४३ ॥

खागें=प्रकारे

तें विश्वरूप अकरावा | अध्यावो संपे जंव आघवा |
तंव कर्में ईशु भजावा | हें जें बोलिलें ॥ १४४४ ॥

तें अष्टाध्यायीं उघड | जाण येथें देवताकांड |
शास्त्र सांगतसे आड | मोडूनि बोलें ॥ १४४५ ॥

आणि तेणेंचि ईशप्रसादें | श्रीगुरुसंप्रदायलब्धें |
साच ज्ञान उद्बोधे | कोंवळें जें ॥ १४४६ ॥

तें अद्वेष्टादि,प्रभृतिकीं | अथवा अमानित्वादिकीं |
वाढविजे म्हणौनि लेखी | बारावा गणूं ॥ १४४७ ॥

तो बारावा अध्याय आदी | आणि पंधरावा अवधी |
ज्ञानफळपाकसिद्धी | निरूपणासीं ॥ १४४८ ॥

म्हणौनि चहूंही इहीं | ऊर्ध्वमूळांतीं अध्यायीं |
ज्ञानकांड ये ठायीं | निरूपिजे ॥ १४४९ ॥

ऊर्ध्वमूळांतीं अध्यायीं=१५ वा

एवं कांडत्रयनिरूपणी | श्रुतीचि हे कोडिसवाणी |
गीतापद्यरत्नांचीं लेणीं | लेयिली आहे ॥ १४५० ॥

कोडिसवाणी=सुंदर

हें असो कांडत्रयात्मक | श्रुति मोक्षरूप फळ येक |
बोभावे जें आवश्यक | ठाकावें म्हणौनि ॥ १४५१ ॥

बोभावे=गरजून सांगणे

तयाचेनि साधन ज्ञानेंसीं | वैर करी जो प्रतिदिवशीं |
तो अज्ञानवर्ग षोडशीं | प्रतिपादिजे ॥ १४५२ ॥

तोचि शास्त्राचा बोळावा | घेवोनि वैरी जिणावा |
हा निरोपु तो सतरावा | अध्याय येथ ॥ १४५३ ॥

बोळावा=रक्षक

ऐसा प्रथमालागोनि | सतरावा लाणी करूनी |
आत्मनिश्वास विवरूनी | दाविला देवें ॥ १४५४ ॥

तया अर्थजातां अशेषां | केला तात्पर्याचा आवांका |
तो हा अठरावा देखा | कलशाध्यायो ॥ १४५५ ॥

आवांका=साकल्य पूर्ण

एवं सकळसंख्यासिद्धु | श्रीभागवद्गीता प्रबंधु |
हा औदार्यें आगळा वेदु | मूर्तु जाण ॥ १४५६ ॥


by dr. vikrant tikone




Monday, April 15, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा, ओव्या१३९० ते १४३४




ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर
ओव्या१३९० ते १४३४


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्ष्ययिष्यामि मा शुचः ॥ ६६॥

(सर्व धर्माचा त्याग करून तू मला एकट्याला शरण ये,मी तुझ्या सर्व पापा पासून मुक्ति देईन  भिवू नकोस)  

आशा जैसी दुःखातें | व्यालीं निंदा दुरितें |
हे असो जैसें दैन्यातें | दुर्भगत्व ॥ १३९० ॥

दैन्यातें =पाप दुर्भगत्व =असमाधान

तैसें स्वर्गनरकसूचक | अज्ञान व्यालें धर्मादिक |
तें सांडूनि घालीं अशेख | ज्ञानें येणें ॥ १३९१ ॥

हातीं घेऊन तो दोरु | सांडिजे जैसा सर्पाकारु |
कां निद्रात्यागें घराचारु | स्वप्नींचा जैसा ॥ १३९२ ॥

नाना सांडिलेनि कवळें | चंद्रींचें धुये पिंवळें |
व्याधित्यागें कडुवाळें\- | पण मुखाचें ॥ १३९३ ॥

अगा दिवसा पाठीं देउनी | मृगजळ घापे त्यजुनी |
कां काष्ठत्यागें वन्ही | त्यजिजे जैसा ॥ १३९४ ॥

तैसें धर्माधर्माचें टवाळ | दावी अज्ञान जें कां मूळ |
तें त्यजूनि त्यजीं सकळ | धर्मजात ॥ १३९५ ॥

टवाळ =बंड घोटाला    (विधी निषेध)

मग अज्ञान निमालिया | मीचि येकु असे अपैसया |
सनिद्र स्वप्न गेलया | आपणपें जैसें ॥ १३९६ ॥

तैसा मी एकवांचूनि कांहीं | मग भिन्नाभिन्न आन नाहीं |
सोऽहंबोधें तयाच्या ठायीं | अनन्यु होय ॥ १३९७ ॥

पैं आपुलेनि भेदेंविण | माझें जाणिजे जें एकपण |
तयाचि नांव शरण | मज यीणें गा ॥ १३९८ ॥

भेदेंविण=भिन्नत्व

जैसें घटाचेनि नाशें | गगनीं गगन प्रवेशे |
मज शरण येणें तैसें | ऐक्य करी ॥ १३९९ ॥

सुवर्णमणि सोनया | ये कल्लोळु जैसा पाणिया |
तैसा मज धनंजया | शरण ये तूं ॥ १४०० ॥

वांचूनि सागराच्या पोटीं | वडवानळु शरण आला किरीटी |
जाळूनि ठाके तया गोठी | वाळूनि दे पां ॥ १४०१ ॥

ठाके=जळून जावून   वाळूनि दे=सोडून दे

मजही शरण रिघिजे | आणि जीवत्वेंचि असिजे |
धिग् बोली यिया न लजे | प्रज्ञा केवीं ॥ १४०२ ॥

अगा प्राकृताही राया | आंगीं पडे जें धनंजया |
तें दासिरूंहि कीं तया | समान होय ॥ १४०३ ॥

प्राकृताही =जगतात  आंगीं पडे=पत्नी होणे  
दासिरूंहि=दासी ही

मा मी विश्वेश्वरु भेटे | आणि जीवग्रंथी न सुटे |
हे बोल नको वोखटें | कानीं लाऊं ॥ १४०४ ॥

वोखटें=खोटे

म्हणौनि मी होऊनि मातें | सेवणें आहे आयितें |
तें करीं हातां येतें | ज्ञानें येणें ॥ १४०५ ॥

मग ताकौनियां काढिलें | लोणी मागौतें ताकीं घातलें |
परी न घेपेचि कांहीं केलें | तेणें जेवीं ॥ १४०६ ॥

तैसें अद्वयत्वें मज | शरण रिघालिया तुज |
धर्माधर्म हे सहज | लागतील ना ॥ १४०७ ॥
लोह उभें खाय माती | तें परीसाचिये संगतीं |
सोनें जालया पुढती | न शिविजे मळें ॥ १४०८ ॥

हें असो काष्ठापासोनि | मथूनि घेतलिया वन्ही |
मग काष्ठेंही कोंडोनी | न ठके जैसा ॥ १४०९ ॥

अर्जुना काय दिनकरु | देखत आहे अंधारु |
कीं प्रबोधीं होय गोचरु | स्वप्नभ्रमु | ॥ १४१० ॥

तैसें मजसी येकवटलेया | मी सर्वरूप वांचूनियां |
आन कांहीं उरावया | कारण असे ? ॥ १४११ ॥

म्हणौनि तयाचें कांहीं | चिंतीं न आपुल्या ठायीं |
तुझें पापपुण्य पाहीं | मीचि होईन ॥ १४१२ ॥

तेथ सर्वबंधलक्षणें | पापें उरावें दुजेपणें |
तें माझ्या बोधीं वायाणें | होऊनि जाईल ॥ १४१३ ॥

वायाणें=व्यर्थ

जळीं पडिलिया लवणा | सर्वही जळ होईल विचक्षणा |
तुज मी अनन्यशरणा | होईन तैसा ॥ १४१४ ॥

येतुलेनि आपैसया | सुटलाचि आहसी धनंजया |
घेईं मज प्रकाशोनियां | सोडवीन तूंतें ॥ १४१५ ॥

प्रकाशोनियां=ज्ञानाने जाणून

याकारणें पुढती | हे आधी न वाहे चित्तीं |
मज एकासि ये सुमती | जाणोनि शरण ॥ १४१६ ॥
ऐसें सर्वरूपरूपसें | सर्वदृष्टिडोळसें |
सर्वदेशनिवासें | बोलिलें श्रीकृष्णें ॥ १४१७ ॥

मग सांवळा सकंकणु | बाहु पसरोनि दक्षिणु |
आलिंगिला स्वशरणु | भक्तराजु तो ॥ १४१८ ॥

न पवतां जयातें | काखे सूनि बुद्धीतें |
बोंलणें मागौतें | वोसरलें ॥ १४१९ ॥

काखे सूनि बुद्धीतें=बुद्धीचा पाड न लागणे

ऐसें जें कांहीं येक | बोला बुद्धीसिही अटक |
तें द्यावया मिष | खेवाचें केलें ॥ १४२० ॥

अटक=अवघड न करत येण्या जोगे

हृदया हृदय येक जाले | ये हृदयींचें ते हृदयीं घातलें |
द्वैत न मोडितां केलें | आपणा{ऐ}सें अर्जुना ॥ १४२१ ॥

दीपें दीप लाविला | तैसा परीष्वंगु तो जाला |
द्वैत न मोडितां केला | आपणपें पार्थुं ॥ १४२२ ॥

परीष्वंगु=अलिंगन मिष

तेव्हां सुखाचा मग तया | पूरु आला जो धनंजया |
तेथ वाडु तऱ्हीं बुडोनियां ॥ ठेला देवो ॥ १४२३॥

सिंधु सिंधूतें पावों जाये | तें पावणें ठाके दुणा होये |
वरी रिगे पुरवणिये | आकाशही ॥ १४२४ ॥

पावणें=भेटणे  दुणा=दुप्पट   रिगे=पसरणे वाढणे

तैसें तयां दोघांचें मिळणें | दोघां नावरे जाणावें कवणें |
किंबहुना श्रीनारायणें | विश्व कोंदलें ॥ १४२५ ॥

एवं वेदाचें मूळसूत्र | सर्वाधिकारैकपवित्र |
श्रीकृष्णें गीताशास्त्र | प्रकट केलें ॥ १४२६ ॥

येथ गीता मूळ वेदां | ऐसें केवीं पां आलें बोधा |
हें म्हणाल तरी प्रसिद्धा | उपपत्ति सांगों ॥ १४२७ ॥

ऐसें केवीं पां=असे कसे समजले  

तरी जयाच्या निःश्वासीं | जन्म झाले वेदराशी |
तो सत्यप्रतिज्ञ पैजेसीं | बोलला स्वमुखें ॥ १४२८ ॥

म्हणौनि वेदां मूळभूत | गीता म्हणों हें होय उचित |
आणिकही येकी येथ | उपपत्ति असे ॥ १४२९ ॥

जें न नशतु स्वरूपें | जयाचा विस्तारु जेथ लपे |
तें तयांचें म्हणिपे | बीज जगीं ॥ १४३० ॥

न नशतु स्वरूपें = स्वरूपाचा नाश न होता

तरी कांडत्रयात्मकु | शब्दराशी अशेखु |
गीतेमाजीं असे रुखु | बीजीं जैसा ॥ १४३१ ॥

कांडत्रयात्मकु=वेद कर्म उपासना ज्ञान

म्हणौनि वेदांचें बीज | श्रीगीता होय हें मज |
गमे आणि सहज | दिसतही आहे ॥ १४३२ ॥

जे वेदांचे तिन्ही भाग | गीते उमटले असती चांग |
भूषणरत्नीं सर्वांग | शोभलें जैसें ॥ १४३३ ॥

तियेचि कर्मादिकें तिन्ही | कांडें कोणकोणे स्थानीं |
गीते आहाति तें नयनीं | दाखऊं आईक ॥ १४३४ ॥


by dr. vikrant tikone