Saturday, May 25, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा,ओव्या १६३२ ते १६७६




ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर

ओव्या १६३२ ते १६७६


यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८॥

जिथे योगेश्वर कृष्ण जिथे पार्थ धनुर्धर तिथे नित्य श्री विजय सामर्थ्य नीती हे माझे मत आहे



ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥



यया बोला संजयो म्हणे | जी येरयेरांचें मी नेणें |
परी आयुष्य तेथें जिणें | हें फुडें कीं गा ॥ १६३२ ॥

येरयेरांचें =बाकीच्याचे   फुडें=खरे

चंद्रु तेथें चंद्रिका | शंभु तेथें अंबिका |
संत तेथें विवेका | असणें कीं जी ॥ १६३३ ॥

रावो तेथें कटक | सौजन्य तेथें सोयरीक |
वन्हि तेथें दाहक | सामर्थ्य कीं ॥ १६३४ ॥

कटक=सैन्यदळ

दया तेथें धर्मु | धर्मु तेथें सुखागमु |
सुखीं पुरुषोत्तमु | असे जैसा ॥ १६३५ ॥

वसंत तेथें वनें | वन तेथें सुमनें |
सुमनीं पालिंगनें | सारंगांचीं ॥ १६३६ ॥

पालिंगनें=समूह सारंगांचीं=भ्रमर  

गुरु तेथ ज्ञान | ज्ञानीं आत्मदर्शन |
दर्शनीं समाधान | आथी जैसें ॥ १६३७ ॥

भाग्य तेथ विलासु | सुख तेथ उल्लासु |
हें असो तेथ प्रकाशु | सूर्य जेथें ॥ १६३८ ॥

तैसे सकल पुरुषार्थ | जेणें स्वामी कां सनाथ |
तो श्रीकृष्ण रावो जेथ | तेथ लक्ष्मी ॥ १६३९ ॥

आणि आपुलेनि कांतेंसीं | ते जगदंबा जयापासीं |
अणिमादिकीं काय दासी | नव्हती तयातें ? ॥ १६४० ॥

कृष्ण विजयस्वरूप निजांगें | तो राहिला असे जेणें भागें |
तैं जयो लागवेगें | तेथेंचि आहे ॥ १६४१ ॥

लागवेगें |=लागलीच

विजयो नामें अर्जुन विख्यातु | विजयस्वरूप श्रीकृष्णनाथु |
श्रियेसीं विजय निश्चितु | तेथेंचि असे ॥ १६४२ ॥

तयाचिये देशींच्या झाडीं | कल्पतरूतें होडी |
न जिणावें कां येवढीं | मायबापें असतां ? ॥ १६४३ ॥

होडी=पैज जिंकणे

ते पाषाणही आघवें | चिंतारत्ने कां नोहावे ? |
तिये भूमिके कां न यावें | सुवर्णत्व ? ॥ १६४४ ॥

भूमिके=जमिनीला

तयाचिया गांवींचिया | नदी अमृतें वाहाविया |
नवल कायि राया | विचारीं पां ॥ १६४५ ॥

तयाचे बिसाट शब्द | सुखें म्हणों येती वेद |
सदेह सच्चिदानंद | कां न व्हावे ते ? ॥ १६४६ ॥

पैं स्वर्गापवर्ग दोन्ही | इयें पदें जया अधीनीं |
तो श्रीकृष्ण बाप जननी | कमळा जया ॥ १६४७ ॥

म्हणौनि जिया बाहीं उभा | तो लक्ष्मीयेचा वल्लभा |
तेथें सर्वसिद्धी स्वयंभा | येर मी नेणें ॥ १६४८ ॥

आणि समुद्राचा मेघु | उपयोगें तयाहूनि चांगु |
तैसा पार्थीं आजि लागु | आहे तये ॥ १६४९ ॥

कनकत्वदीक्षागुरू | लोहा परिसु होय कीरू |
परी जगा पोसिता व्यवहारु | तेंचि जाणें ॥ १६५० ॥

येथ गुरुत्वा येतसे उणें | ऐसें झणें कोण्ही म्हणे |
वन्हि प्रकाश दीपपणें | प्रकाशी आपुला ॥ १६५१ ॥

तैसा देवाचिया शक्ती | पार्थु देवासीचि बहुती |
परी माने इये स्तुती | गौरव असे ॥ १६५२ ॥
माने=तुलनेने

आणि पुत्रें मी सर्व गुणीं | जिणावा हे बापा शिराणी |
तरी ते शारङ्गपाणी | फळा आली ॥ १६५३ ॥

शिराणी=इच्छा

किंबहुना ऐसा नृपा | पार्थु जालासे कृष्णकृपा |
तो जयाकडे साक्षेपा | रीति आहे ॥ १६५४ ॥

साक्षेपा=सावध विचारपूर्वक योग्य

तोचि गा विजयासि ठावो | येथ तुज कोण संदेहो ? |
तेथ न ये तरी वावो | विजयोचि होय ॥ १६५५ ॥

वावो=वाउगा

म्हणौनि जेथ श्री तेथें श्रीमंतु | जेथ तो पंडूचा सुतु |
तेथ विजय समस्तु | अभ्युदयो तेथ ॥ १६५६ ॥

अभ्युदयो=एहिक उत्कर्ष

जरी व्यासाचेनि साचें | धिरे मन तुमचें |
तरी या बोलाचें | ध्रुवचि माना ॥ १६५७ ॥

साचें =खरे बोलणे  धिरे=भरवसा विश्वास

जेथ तो श्रीवल्लभु | जेथ भक्तकदंबु |
तेथ सुख आणि लाभु | मंगळाचा ॥ १६५८ ॥

भक्तकदंबु=भक्तश्रेष्ठ (अर्जुन)  

या बोला आन होये | तरी व्यासाचा अंकु न वाहे |
ऐसें गाजोनि बाहें | उभिली तेणें ॥ १६५९ ॥

अंकु=शिष्यत्व

एवं भारताचा आवांका | आणूनि श्लोका येका |
संजयें कुरुनायका | दिधला हातीं ॥ १६६० ॥

आवांका=सारांश

जैसा नेणों केवढा वन्ही | परी गुणाग्रीं ठेऊनी |
आणिजे सूर्याची हानी | निस्तरावया ॥ १६६१ ॥

गुणाग्रीं=वात हानी=कमीपणा

तैसें शब्दब्रह्म अनंत | जालें सवालक्ष भारत |
भारताचें शतें सात | सर्वस्व गीता ॥ १६६२ ॥

तयांही सातां शतांचा | इत्यर्थु हा श्लोक शेषींचा |
व्यासशिष्य संजयाचा | पूर्णोद्गारु जो ॥ १६६३ ॥

येणें येकेंचि श्लोकें | राहे तेणें असकें |
अविद्याजाताचें निकें | जिंतलें होय ॥ १६६४ ॥

असकें=संपूर्ण निकें=खरोखर

ऐसें श्लोक शतें सात | गीतेचीं पदें आंगें वाहत |
पदें म्हणों कीं परमामृत | गीताकाशींचें ॥ १६६५ ॥
 
कीं आत्मराजाचिये सभे | गीते वोडवले हे खांबे |
मज श्लोक प्रतिभे | ऐसे येत ॥ १६६६ ॥

वोडवले=उभारले

कीं गीता हे सप्तशती | मंत्रप्रतिपाद्य भगवती |
मोहमहिषा मुक्ति | आनंदली असे ॥ १६६७ ॥

म्हणौनि मनें कायें वाचा | जो सेवकु होईल इयेचा |
तो स्वानंदासाम्राज्याचा | चक्रवर्ती करी ॥ १६६८ ॥

कीं अविद्यातिमिररोंखें | श्लोक सूर्यातें पैजा जिंकें |
ऐसे प्रकाशिले गीतामिषें | रायें श्रीकृष्णें ॥ १६६९ ॥

रोंखें=दृष्टीने

कीं श्लोकाक्षरद्राक्षलता | मांडव जाली आहे गीता |
संसारपथश्रांता | विसंवावया ॥ १६७० ॥

कीं सभाग्यसंतीं भ्रमरीं | केले ते श्लोककल्हारीं |
श्रीकृष्णाख्यसरोवरीं | सासिन्नली हे ॥ १६७१ ॥

कल्हारीं=कमळे सासिन्नली=बहरास आली

कीं श्लोक नव्हती आन | गमे गीतेचें महिमान |
वाखाणिते बंदीजन | उदंड जैसे ॥ १६७२ ॥

बंदीजन=भाट

कीं श्लोकांचिया आवारा | सात शतें करूनि सुंदरा |
सर्वागम गीतापुरा | वसों आले ॥ १६७३ ॥

सर्वागम=सर्व आगम (शास्त्रे)

कीं निजकांता आत्मया | आवडी गीता मिळावया |
श्लोक नव्हती बाह्या | पसरु का जो ॥ १६७४ ॥

आवडी=प्रेमाने  मिळावया=भेटायला

कीं गीताकमळींचे भृंग | कीं हे गीतासागरतरंग |
कीं हरीचे हे तुरंग | गीतारथींचे ॥ १६७५ ॥

तुरंग=घोडे

कीं श्लोक सर्वतीर्थ संघातु | आला श्रीगीतेगंगे आंतु |
जे अर्जुन नर सिंहस्थु | जाला म्हणौनि ॥ १६७६ ॥



by dr. vikrant tikone

Monday, May 20, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा ओव्या १६०९ ते १६३१




ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर

ओव्या १६०९ ते १६३१

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५॥
व्यास प्रसादे ऐकले परम गुह्य योग रहस्य जे योगेश्वर कृष्णाने केले प्रत्यक्ष कथन स्वये

तेव्हां बैसतेनि आनंदें | म्हणे जी, जें उपनिषदें |
नेणती, तें व्यासप्रसादें | ऐकिलें मियां ॥ १६०९ ॥

बैसतेनि=ओसरल्यावर

ऐकतांचि ते गोठी | ब्रह्मत्वाची पडिली मिठी |
मीतूंपणेंसीं दृष्टी | विरोनि गेली ॥ १६१० ॥

हे आघवेचि का योग | जया ठाया येती मार्ग |
तयाचें वाक्य सवंग | केलें मज व्यासें ॥ १६११ ॥

सवंग=सोपे

अहो अर्जुनाचेनि मिषें | आपणपेंचि दुजें ऐसें |
नटोनि आपणया उद्देशें | बोलिलें जें देव ॥ १६१२ ॥

तेथ कीं माझें श्रोत्र | पाटाचें जालें जी पात्र |
काय वानूं स्वतंत्र | सामर्थ्य श्रीगुरुचें ॥ १६१३ ॥

पाटाचें=थोर मोठे


राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६॥
हे राजन, आठवून संवाद अद्भुत केशव अर्जुनाचा हा पुण्यमय हर्षतो मी पुन्हा पुन्हा

राया हें बोलतां विस्मित होये | तेणेंचि मोडावला ठाये |
रत्नीं कीं रत्नकिळा ये | झांकोळित जैसी ॥ १६१४ ॥

मोडावला=थांबला झांकोळित=पसरणे

हिमवंतींचीं सरोवरें |चंद्रोदयीं होती काश्मीरें |
मग सूर्यागमीं माघारें | द्रवत्व ये ॥ १६१५ ॥

काश्मीरें=स्फटिका सारखी

तैसा शरीराचिया स्मृती | तो संवादु संजय चित्तीं |
धरी आणि पुढती | तेंचि होय ॥ १६१६ ॥

तेंचि होय==तल्लीन होतो  

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७॥

ते स्मरस्मरून रूप अद्भुत हरीचे हे राजन मला महाविस्मय होवून पुन्हा पुन्हा हर्ष होत आहे

मग उठोनि म्हणे नृपा | श्रीहरीचिया विश्वरूपा |
देखिलया उगा कां पां | असों लाहसी ? ॥ १६१७ ॥

असों लाहसी =आहे तसाच अससी

न देखणेनि जें दिसे | नाहींपणेंचि जें असे |
विसरें आठवे तें कैसें | चुकऊं आतां | ॥ १६१८ ॥
देखोनि चमत्कारु | कीजे, तो नाहीं पैसारु |
मजहीसकट महापूरु | नेत आहे ॥ १६१९ ॥

पैसारु=विस्तार (दुसरेपणाचा)

ऐसा श्रीकृष्णार्जुन- | संवाद संगमीं स्नान |
करूनि देतसे तिळदान | अहंतेचें ॥ १६२० ॥
 
तेथ असंवरें आनंदें | अलौकिकही कांहीं स्फुंदे |
श्रीकृष्ण म्हणे सद्गदें | वेळोवेळां ॥ १६२१ ॥

असंवरें=अनावर

या अवस्थांची कांहीं | कौरवांतें परी नाहीं |
म्हणौनि रायें तें कांहीं | कल्पावें जंव ॥ १६२२ ॥

परी=पर्वा कल्पना

तंव जाला सुखलाभु | आपणया करूनि स्वयंभु |
बुझाविला अवष्टंभु | संजयें तेणें ॥ १६२३ ॥

स्वयंभु=आपोआप

तेथ कोणी येकी अवसरी | होआवी ते करूनि दुरी |
रावो म्हणे संजया परी | कैसी तुझी गा ? ॥ १६२४ ॥

होआवी=जे करायचे

तेणें तूंतें येथें व्यासें | बैसविलें कासया उद्देशें |
अप्रसंगामाजीं ऐसें | बोलसी काई ? ॥ १६२५ ॥

रानींचें राउळा नेलिया | दाही दिशा मानी सुनिया |
कां रात्री होय पाहलया | निशाचरां ॥ १६२६ ॥

रानींचें=रानातील माणूस (भिल्ल वगैरे) राउळा=राजमंदिरी
पाहलया=उजाडता

जो जेथिंचें गौरव नेणें | तयासि तें भिंगुळवाणें |
म्हणौनि अप्रसंगु तेणें | म्हणावा कीं तो ॥ १६२७ ॥

भिंगुळवाणें=विपरीत गोंधळणे

मग म्हणे सांगें प्रस्तुत | उदयलेंसे जें उत्कळित |
तें कोणासि बा रे जैत | देईल शेखीं ? ॥ १६२८ ॥

उत्कळित=युद्ध जैत=विजय

येऱ्हवीं विशेषें बहुतेक | आमुचें ऐसें मानसिक |
जे दुर्योधनाचे अधिक | प्रताप सदा ॥ १६२९ ॥

आणि येरांचेनि पाडें | दळही याचें देव्हडें |
म्हणौनि जैत फुडें | आणील ना तें ? ॥ १६३० ॥

देव्हडें=दीड पट   फुडें=खरोखर नक्की

आम्हां तंव गमे ऐसें | मा तुझें ज्योतिष कैसें |
तें नेणों संजया असे | तैसें सांग पां ॥ १६३१ ॥
by dr. vikrant tikone


Wednesday, May 15, 2019

ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ वा ओव्या १५८८ ते १६०८


 

ज्ञानेश्वरी / अध्याय अठरावा / संत ज्ञानेश्वर

ओव्या १५८८ ते १६०८
सञ्जय उवाच।
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४॥

असा हा वासुदेव पार्थ या महात्म्यांचा संवाद ऐकला मी  रोमहर्षकारी अद्भुत


मग म्हणे पैं कुरुराजा | ऐसा बंधुपुत्र तो तुझा |
बोलिला तें अधोक्षजा | गोड जालें ॥ १५८८ ॥

अधोक्षजा=कृष्णा

अगा पूर्वापर सागर | ययां नामसीचि सिनार |
येर आघवें तें नीर | एक जैसें ॥ १५८९ ॥

पूर्वापर=पूर्व पश्चिम सिनार=वेगळे

तैसा श्रीकृष्ण पार्थ ऐसें | हें आंगाचिपासीं दिसे |
मग संवादीं जी नसे | कांहींचि भेदु ॥ १५९० ॥

पैं दर्पणाहूनि चोखें | दोन्ही होती सन्मुखें |
तेथ येरी येर देखे | आपणपें जैसें ॥ १५९१ ॥

तैसा देवेसीं पंडुसुतु | आपणपें देवीं देखतु |
पांडवेंसीं देखे अनंतु | आपणपें पार्थीं ॥ १५९२ ॥

देव, देवो भक्तालागीं | जिये, विवरूनि देखे आंगीं |
येरु तियेचेही भागीं | दोन्ही देखे ॥ १५९३ ॥
देवो=देवपण
विवरूनि=वेगवेगळ्या जागी
येरु=दूसरा (अर्जुन )

आणिक कांहींच नाहीं | म्हणौनि करिती काई |
दोघे येकपणें पाहीं | नांदताती ॥ १५९४ ॥

आतां भेदु जरी मोडे | तरी प्रश्नोत्तर कां घडे ? |
ना भेदुचि तरी जोडे | संवादसुख कां ? ॥ १५९५ ॥

ऐसें बोलतां दुजेपणें | संवादीं द्वैत गिळणें |
तें ऐकिलें बोलणें | दोघांचें मियां ॥ १५९६ ॥
उटूनि दोन्ही आरिसे | वोडविलीया सरिसे |
कोण कोणा पाहातसे | कल्पावें पां ? ॥ १५९७ ॥

कां दीपासन्मुखु | ठेविलया दीपकु |
कोण कोणा अर्थिकु | कोण जाणें ॥ १५९८ ॥

अर्थिकु=प्रकाशक

नाना अर्कापुढें अर्कु | उदयलिया आणिकु |
कोण म्हणे प्रकाशकु | प्रकाश्य कवण ? ॥ १५९९ ॥

हें निर्धारूं जातां फुडें | निर्धारासि ठक पडे |
ते दोघे जाले एवढे | संवादें सरिसे ॥ १६०० ॥

निर्धारूं=ठरवणे ठक=स्तब्ध होणे

जी मिळतां दोन्ही उदकें | माजी लवण वारूं ठाके |
कीं तयासींही निमिखें | तेंचि होय ॥ १६०१ ॥

वारूं ठाके=मध्ये उभे राहणे, रोखणे  

तैसे श्रीकृष्ण अर्जुन दोन्ही | संवादले तें मनीं |
धरितां मजही वानी | तेंचि होतसे ॥ १६०२ ॥

वानी=प्रकार

ऐसें म्हणे ना मोटकें | तंव हिरोनि सात्विकें |
आठव नेला नेणों कें | संजयपणाचा ॥ १६०३ ॥

मोटकें=एवढेच जेमतेम

रोमांच जंव फरके | तंव तंव आंग सुरके |
स्तंभ स्वेदांतें जिंके | एकला कंपु ॥ १६०४ ॥

सुरके=संकुचित होणे (आत ओढले जावून ताठ होणे)
 
अद्वयानंदस्पर्शें | दिठी रसमय जाली असे |
ते अश्रु नव्हती जैसें | द्रवत्वचि ॥ १६०५ ॥

द्रवत्वचि=(प्रेम )प्रवाह

नेणों काय न माय पोटीं | नेणों काय गुंफे कंठीं |
वागर्था पडत मिठी | उससांचिया ॥ १६०६ ॥

वागर्था=बोलणे

किंबहुना सात्विकां आठां | चाचरु मांडतां उमेठा |
संजयो जालासे चोहटां | संवादसुखाचा ॥ १६०७ ॥

चाचरु मांडतां =मौन पडता  उमेठा=खूप

तया सुखाची ऐसी जाती | जे आपणचि धरी शांती |
मग पुढती देहस्मृती | लाधली तेणें ॥ १६०८ ॥

by dr. vikrant tikone